15 February 2026
शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र के रचनाकार, आदि गुरु शंकराचार्य, जिनके हृदय में असीम शिवभक्ति समाहित थी, इस अद्भुत स्तोत्र के माध्यम से हमारे ह्रदयों में शिव के दिव्य स्वरूप का महत्त्वपूर्ण उद्घाटन करते हैं। यह स्तोत्र, जो 'नमः शिवाय' के पंचाक्षरी मंत्र पर आधारित है, पाँच प्रमुख तत्वों को अभिव्यक्त करता है। प्रत्येक अक्षर अपने भीतर जीवन के आन्तरिक तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है:
यह स्तोत्र, न केवल शिव के अस्तित्व को व्याख्यायित करता है, बल्कि उनके अमर रूप और अविनाशी शाश्वतता का असीम दर्शन प्रदान करता है।
सर्वशक्तिमान शिव, जिनके गले में सर्पों का हार और तीन नेत्र हैं, जिनके अंगों पर भस्म का लेप है और जिनका वस्त्र स्वयं दिशाएँ हैं, अर्थात् जो दिगम्बर हैं – वे शुद्ध, अविनाशी महेश्वर शिव को नमन है। वे परम तत्त्व हैं, जिनकी उपासना से जीवन के समस्त विघ्न दूर हो जाते हैं।
गंगा जल और चन्दन से जिनकी पूजा होती है, जिनकी पूजा में मन्दार पुष्प और अन्य शुद्ध पुष्पों की समर्पित अर्चना होती है, वे नन्दी के स्वामी और शिवगणों के अधिपति महेश्वर, शुद्ध और पूर्ण रूप में शिव को प्रणाम है। जिनकी महिमा अनन्त है, वे सर्वदा हमारे ह्रदय में निवास करते हैं।
जो पूरे ब्रह्माण्ड के कल्याण हेतु समर्पित हैं, जो पार्वती के प्रेम से वशीभूत होकर सूर्य रूप में विकसित हुए, जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया, और जिनकी ध्वजा पर वृषभ (बैल) का चिह्न है – ऐसे नीलकण्ठ, शिव के दिव्य रूप को शरण में लेकर हम अपने जीवन को धन्य करते हैं। उनका रूप अनंत है, उनका तेज निरंतर बढ़ता है, और उनकी आशीर्वाद से जीवन सुखमय होता है।
वे शिव, जिनके मस्तक को वशिष्ठ मुनि, अगस्त्य ऋषि, गौतम ऋषि तथा देवताओं ने पूजा है, जिनके नेत्र चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में साकार हैं, उन दिव्य शिव को हम नमन करते हैं। उनके दर्शन से जीवन में परम सुख और शांति का आभास होता है। वे ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो सत्य और ज्ञान के मार्ग पर हमारे पथ प्रदर्शक हैं।
शिव के ऐसे रूप का ध्यान करें, जो यक्ष रूप में प्रकट होते हैं, जो जटाधारी और पिनाकधारी हैं, जिनके हाथ में त्रिशूल और धनुष है, और जो सनातन परम पुरुष रूप में उभरते हैं। दिगम्बर रूप में उनके दर्शन से समस्त सांसारिक बन्धनों से मुक्ति मिलती है और आत्मा को शांति का अनुभव होता है।
जो व्यक्ति इस पवित्र शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र का उच्चारण करता है, वह शिव की कृपा से शिवलोक में प्रवेश करता है। वहाँ शिव के साथ अनन्त सुख और शांति का अनुभव करता है। उनके आशीर्वाद से आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में परम आनंद का अनुभव होता है।
शिव की उपासना, शिव के साकार और निराकार रूप के साथ, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सृजन, पालन और संहार के चक्र को समझने की दिशा में एक अहम कदम है। शिव का मार्ग सत्य, ज्ञान और मोक्ष की ओर जाता है।
नमः शिवाय – शिव के चरणों में शरण
वैश्विक सनातन सेवा समिति (रजि.)